---------------------- Unsung heroes - 1 ------------------
..............................अष्टक और अश्वक ...........................
यूनान की महानता के द्वार थर्मोपायली पर वीर लियोनाइडस और उसके ३०० स्पार्टन वीरों के बलिदान की गाथा सुनाता एक अभिलेख है जिसके मर्मस्पशी शब्द हैं-
Stranger, go tell the Spartans
That we lie here
True, even to the death
To our Spartan way of life
इन शब्दों में ही पश्चिमी सभ्यता की महानता और सार्वभौमिकता का राज छिपा हुआ है . पश्चिम ने कभी अपने वीरों और उनके बलिदानों को हमारी तरह बिसराया नहीं और नतीजा पश्चिमी सभ्यता संसार भर में व्याप्त हो गयी . उनकी स्वातंत्रयप्रियता , बलिदान और उनसे प्राप्त प्रेरणा ने ही पश्चिमी सभ्यता को विश्वव्यापी बनाया है .
इसके विपरीत हमने क्या किया ? अपने वीरों को , उनके बलिदानों को कपोल कल्पनायें कहकर उन्हें बिसरा दिया , मुँह मोड लिया उनकी पहचान से , उनके दर्द से और उन्हें इतिहास में दफन कर दिया . हमने खुद पराजयबोध ओढ लिया . हमने मान लिया कि हम तो हारते ही आये हैं और हम तो बने ही हारने और गुलामी के लिये . हमने अपने उन हुतात्माओं की प्रचंड वीरगाथाओं को ' मिथक ' करार दे दिया जिनके कारण ही हम गर्व से कहते आये हैं कि -- " कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी "
पर कभी जाना कितने अनजाने नायकों के शवों पर आपकी आज की आजादी खडी है ?
आज भारत के अनन्य स्वतंत्रता सेनानी और भारत में " गुरिल्ला युद्ध पद्दति के जन्मदाता " वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की पुण्य तिथि पर मेरा प्रयास है भारत के उन अनजान वीरों को फेसबुक के माध्यम से सामने लाना जिन्हें वर्तमान धूर्त वामपंथी और मुस्लिम तुष्टिकरण वादी इतिहासकारों द्वारा षडयंत्रपूर्वक जानबूझकर भुला दिया गया -
मैं अपना छोटा सा प्रयास महाकवि श्रीकृष्ण ' सरल ' की इन पंक्तियों के साथ प्रारंभ करता हूँ -
" मैं अमर शहीदों का चारण , उनके यश गाया करता हूँ ,
जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है मैं उसे चुकाया करता हूँ . "
------------------------- अष्टक और अश्वक -------------------------
हममें से अधिकतर लोग जानते हैं कि भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम आक्रांता सिकंदर ( अलैग्जैंडर ) था पर ये पूरी तरह सही नहीं है भारत पर जिस देश ने सबसे पहले हमला किया था वो था पर्शिया ( आज का ईरान ) और आक्रांता था - सायरस महान ( ५५८ - ५३० ई.पू. ) . इसकी भेजी प्रथम सेना वीर अष्टकों और अश्वकों की तलवारों की भेंट चढ गयी . द्वितीय अभियान में उसने अभूतपूर्व क्रूरता प्रदर्शित की जिसके कारण उसका अधिकार पूर्वी गांधार पर हो गया पर ये भाग कभी भी उसके प्रत्यक्ष शासन में ना आ सके . सायरस के पुत्र डरायस प्रथम ने पश्चिमी गांधार पर अभियान किया और केवल खुद बचकर आ सका . उसके वंशज जरक्सीज और अर्टाजरक्सीज भी व्यर्थ ही इस क्षेत्र को अपने अधिकार में रखने की कोशिश करते रहे पर कभी सफल ना हो सके और आखिरकार उन्हें गांधार से विदा होना ही पडा .
ये " अष्टक और अश्वक " ही थे , भारत की प्रथम सुरक्षा दीवार जिन्हें हम शायद ही जानते हों कि एक हाथ में खड्ग और एक हाथ में शास्त्रों को धारण कर किस तरह इन्होंने अपने समतामूलक गणतंत्र की रक्षा की , कि किस तरह इनकी पीढियों ने अपना खून ईरानियों को सिंधु पार करने से रोकने के लिये बहाया , कि किस तरह इन महान वीरों ने भारत के गौरव की रक्षा की .
आज मैं इन अज्ञात वीरों को उनके " गणनाम " की पहचान के आधार पर ही प्रणाम करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि इनके भटके हुए वर्तमान वंशजों को उनकी जातीय स्मृति लौटायें कि आर्यत्व की रक्षा के लिये किस तरह उनके पूर्वज जिये और मरे
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