Saturday, 31 January 2015

---------------------     Unsung Heroes - 2      --------------------


                .......................        कठ       .........................


आप इतिहास की सामान्य जानकारी रखने वाले किसी भी व्यक्ति से पूछिये कि सिकंदर से भारत में कौन लडा था ? किसने उसे वापस जाने पर मजबूर किया था ?? तुरंत जवाब मिलेगा - पोरस .

पर क्या वास्तव में यही सचाई है ? या अधूरी सचाई है ?? महान ईरानी साम्राज्य को ध्वस्त करने वाली , पोरस के हाथियों के सामने भी डटकर खडी रहने वाली सिकंदर की विश्वविजयी सेना ने विपाशा ( व्यास ) नदी से आगे बढने  इंकार कर सिकंदर से विद्रोह क्यों कर दिया ? किससे डर गये थे वे ?? यूनानी इतिहासकारों ने तो उनके इस ' डर ' को  छिपाया ही है , भारतीय इतिहासकारों ने भी " व्यक्ति पूजा " की प्रवृत्ति के चलते इस घटना के महान नायकों को नेपथ्य में डाल दिया .
और ये थे............ " कठ " .

कौन थे ये " कठ " ? क्या विशेषता थी इनकी ?? क्यों यूनानी इनसे जीत कर भी अपना साहस गंवा बैठे थे ??? आइये जानते हैं ...

वैदिक आर्यों का एक प्रसिद्ध जन " मद्र " ( नकुल सहदेव की माँ इसी मद्र की राजकुमारी थीं ) था जो रावी नदी के किनारे अवस्थित था और शाकल ( स्यालकोट ) इनकी राजधानी थी . कालांतर में इनकी ही एक शाखा " कठ " सर्वाधिक प्रभुत्वपूर्ण सिद्ध हुई क्योंकि इन्होंने आज से २५०० साल पहले " यूजेनिक्स " के सिद्धांत अपनाकर जैसी उच्च उपलब्धियाँ अर्जित कीं उसकी तुलना कुछ हद तक सिर्फ " स्पार्टा " ,  " मालवों " और पूर्वी भारत के " लिच्छिवियों " से ही की जा सकती है . स्पार्टा के लोगों की ही भांति कठ अपने यहाँ ' शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर " और " असुंदर " शिशुओं को जीने नहीं देते थे और उन्हें मार डालते थे . इसके परिणाम स्वरूप हर कठ युवक  क्षीर गौर वर्ण ,पीत केश , नील या स्वर्ण वर्णी नेत्र  , अत्यधिक लंबाई , दृढ शरीर और उच्च मस्तिष्क का स्वामी होता था . शस्त्रों और शास्त्रों में इनकी समान गति थी . जितने भयंकर ये योद्धा थे उतने ही अधिक चिंतनशील थे जिसका प्रमाण है " कठोपनिषद " ....

जी हाँ प्रसिद्ध उपनिषदकार -" नचिकेता " इसी कठ गणराज्य के गणक्षत्रिय थे जो प्रसिद्ध ऋषि बने .

अस्तु , झेलम के युद्ध में पोरस पर विजय ( ? ) या संधि के पश्चात सिकंदर आगे बढा और जा टकराया कठों से जिन्होंने अपने नगर सांकल के चारों ओर एक अद्भुत व्यूह रच दिया जिसके बारे में सिकंदर ने सुना तक नहीं था - " रथ व्यूह " एक एसा व्यूह जिसका उपयोग २००० साल बाद यूरोप में  महान चैक हीरो " यान झीझका " ने  प्रशियन नाइट्स के विरुद्ध  अभेद्य " शकट व्यूह " के रूप में किया . ...बेचारा सिकंदर...... उसके तथाकथित अजेय अश्वारोही जाते और इस व्यूह से सिर टकराकर अपनी बलि दे देते ....हजारों की संख्या में यूनानी मारे गये और सिकंदर हताश हो उठा ...पर ....पर...पर ...हाय रे भारत का दुर्भाग्य...... हमेशा की तरह ...इन वीरों को " स्वघात "  का सामना करना पडा और इस बार ये काम किया खुद " पोरस " ने जी हाँ पोरस ने  ...रथ व्यूह को सिर्फ हाथियों से ही तोडा जा सकता था और ये बात पोरस जानता था और उसने अपने साम्राज्य को बढाने के लालच में यह देशघाती कृत्य किया . ( हालांकि बाद में उसे इसका पश्चाताप हुआ और चंद्रगुप्त के विद्रोह को सहायता देकर इसका प्रायश्चित्त भी किया जिसके कारण ही यूनानी क्षत्रप यूथेडेमस ने उसकी हत्या कर दी थी .)
रथ व्यूह टूट जाने पर भी कठों ने हथियार डालना स्वीकार नहीं किया और सैकडों युनानियों को मारते हुए अपने प्राण दे दिये . लगभग १७००० पुरुष लडते मारे गये और ७०००० स्त्रियों और बच्चों को बंदी बनाया गया , जिनका क्या हुआ पता नहीं . सांगल को इतनी बुरी तरह नष्ट किया गया कि आज तक इतिअहासकार उसके ध्वंसावशेषों को ढूँढ नहीं पाये हैं .

परंतु इस भीषण प्रतिरोध से यूनानी सैनिक इतने आतांकित हो गये कि व्यास के किनारे उन्होंने आगे बढने से साफ इनकार कर दिया और सिकंदर को लौटने के लिये विवश होना पडा . परंतु युद्ध के नियमों के विपरीत  कठों के भीषण नरसंहार से भन्नाये हुए  भारतीयों ने जैसे सिकंदर को भारत से जिंदा बाहर ना जाने देने की सौगंध खा ली थी और तब सिकंदर को सामना करना पडा मालवों का जिनके दिये घाव ,कहते हैं कि सिकंदर की मृत्यु का कारण बने . ( इन मालवों के बारे में अगले अंक में )  ------- तो ये थे वे महान कठ जिनके कारण उत्पन्न जनाक्रोश चंद्रगुप्त मौर्य के द्वारा भारत के राष्ट्रीय एकीकरण का आधार बना .

इसके बाद फिर कठों के बारे में फिर कभी कुछ नहीं सुना गया . तैमूरनामा में किसी " कोठार " जाति का उल्लेख अवश्य है जिसने पंजाब में तैमूर की सेना की भीषण क्षति की थी और मेरा मानना है कि ये उन्हीं कठों के अवशिष्ट वंशज रहे होंगे . इसके बाद कालदेवता यम से भी जीतकर लौट आने वाले नचिकेता के कठों का नाम भारत के इतिहास से सदा के लिये विलुप्त हो गया .

आज  २५ जनवरी , गणतंत्र दिवस के पूर्व दिवस पर भारत के इन महान सपूतों को जिनके रक्त से भारत की महानता की नींव रखी गयी ,  अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि .......मेरी ओर से ....मेरे  कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से  ..जिन्होंने हमारे आज के लिये अपने खुद के वर्तमान को मिटा दिया और इतिहास के पन्नों में चुपचाप समा गये .......

........................        प्राचीन भारत के गणतंत्र       ..........................

" अष्टक और अश्वकों " के संदर्भ में इनसे संबंधित कई तथ्य हम लोग नहीं जानते इसलिये " Unsung Heroes " की कडी आगे बढाने से पूर्व भारत के इतिहास के उस कालखंड और उस युग की कुछ राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियों के बारे में चर्चा करना उचित रहेगा . इसलिये मैं इस पूरक लेख को प्रस्तुत कर रहा हूँ .
भारत में प्राचीन काल से दो राजनैतिक और सामाजिक धारायें थीं - एक समतावादी परंतु रक्त संबंध आधारित गणतंत्र प्रणाली और दूसरी जन्मना जाति व्यवस्था आधारित साम्राज्यवादी राजतंत्र प्रणाली . मगध , अवंति , कौशांबी , काशी आदि कुछ जनपदों को छोडकर प्रायः शेष भाग में " गणतंत्र प्रणाली " ही प्रचलित थी जिनमें कभी कभी कुछ व्यक्ति अत्यधिक शक्तिशाली होकर उन्हें " राजतंत्र " में बदलने की कोशिश भी करते थे परंतु प्रायः उनके गण सद्स्य कम या अधिक समय बाद उसे वापस " गणतंत्र " के रूप में ले आते थे . एसा तब तक चलता रहा जबतक कि पूर्व के गण्तंत्रों को मगध साम्राज्य ने और उत्तर व पश्चिम के गणतंत्रों को गुप्त साम्राज्य ने स्थाई रूप से निगल ना लिया .
अस्तु ! गणक्षत्रियों के नेतृत्व वाले गणतंत्रों के नाम या तो उनके किसी पूर्वज ( मालव , लिच्छिवि , यौधेय, शिवि ) , भौगोलिक क्षेत्र ( क्षुद्रक , गोरी ) या उनके टॉटेम ( अश्व , हस्ति , काक , गज , नाग , मूषिक , उदुंबर ) आदि के नाम पर होता था . पूरा उत्तरी भारत और उत्तर पश्चिम से सुदूर ऑक्सस नदी तक का क्षेत्र एसे गणतंत्रों से भरा पडा था और हर आक्रमणकारी को पहले भारत की इस प्रथम सुरक्षा दीवार से टकराना होता था .
ये गणतंत्र अपनी संसद का चुनाव करते थे , विषयों पर संसद में बहस होती थी और वोटिंग द्वारा बहुमत से प्रस्ताव पारित होता था . गणतंत्र का प्रत्येक सद्स्य रक्तसंबंध के कारण " समान " माना जाता था और प्रत्येक व्यक्ति वेद शास्त्रों में प्रवीण था और शिक्षा , व्यापार आदि कोई भी व्यवसाय करने के लिये स्वतंत्र था परंतु शस्त्र शिक्षा और आवश्यकता पडने पर युद्ध में शामिल होना सभी के लिये अनिवार्य था . ( हालांकि अधिकतर सद्स्य शस्त्रोपजीवी ही ज्यादा थे )
इन गणतंत्रों की तीन मूल कमजोरियाँ थीं - १ - इनका गणतंत्र केवल रक्त संबंधी सद्स्य को ही प्रशासन में भाग लेने देता था . २-- ये परस्पर बहुत युद्धरत रहते थे . ३- साम्राज्यवादी वर्णव्यवस्था के विरुद्ध ये सदैव प्रतिरक्षात्मक ही रह पाते थे . ( इस दृष्टि से ये अपने परवर्ती वंशजों राजपूतों की ही भांति थे ) और एक पराजय से ही इनका समूल नाश हो जाता था जैसे कि मगध के द्वारा लिच्छिवियों का , सिकंदर, शक , कुषाणों , हूणों के द्वारा इन पश्चिमोत्तर गणों का और गुप्त साम्राज्य द्वारा अंतिम गणराज्यों यौधेय , आर्जुनायन , कूणिंद और मालवों का हुआ जिनके अवशिष्ट वंशजो + राजतंत्री क्षत्रियों + अवशिष्ट शक , हूण , कुषाण आदि के स्थानीय वंशजों के रक्त मिश्रण से वर्तमान राजपूतों , ब्राह्मणों , गुर्जरों , जाटों और अग्रवालों के कुछ गोत्रों की उत्पत्ति हुई .

---------------------- Unsung heroes  - 1  ------------------

..............................अष्टक  और अश्वक ...........................


यूनान की महानता के द्वार थर्मोपायली पर वीर लियोनाइडस और उसके ३०० स्पार्टन वीरों के बलिदान की गाथा सुनाता एक अभिलेख है जिसके मर्मस्पशी शब्द हैं-
Stranger, go tell the Spartans
That we lie here
True, even to the death
To our Spartan way of life
इन शब्दों में ही पश्चिमी सभ्यता की महानता और सार्वभौमिकता का राज छिपा हुआ है . पश्चिम ने कभी अपने वीरों और उनके बलिदानों को हमारी तरह बिसराया नहीं और नतीजा पश्चिमी सभ्यता संसार भर में व्याप्त हो गयी . उनकी स्वातंत्रयप्रियता , बलिदान और उनसे प्राप्त प्रेरणा ने ही पश्चिमी सभ्यता को विश्वव्यापी बनाया है .
इसके विपरीत हमने क्या किया ? अपने वीरों को , उनके बलिदानों को कपोल कल्पनायें कहकर उन्हें बिसरा दिया , मुँह मोड लिया उनकी पहचान से , उनके दर्द से और उन्हें इतिहास में दफन कर दिया . हमने खुद पराजयबोध ओढ लिया . हमने मान लिया कि हम तो हारते ही आये हैं और हम तो बने ही हारने और गुलामी के लिये . हमने अपने उन हुतात्माओं की प्रचंड वीरगाथाओं को ' मिथक ' करार दे दिया जिनके कारण ही हम गर्व से कहते आये हैं कि -- " कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी "
पर कभी जाना कितने अनजाने नायकों के शवों पर आपकी आज की आजादी खडी है ?
आज भारत के अनन्य स्वतंत्रता सेनानी और भारत में " गुरिल्ला युद्ध पद्दति के जन्मदाता " वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की पुण्य तिथि पर मेरा प्रयास है भारत के उन अनजान वीरों को फेसबुक के माध्यम से सामने लाना जिन्हें वर्तमान धूर्त वामपंथी और मुस्लिम तुष्टिकरण वादी इतिहासकारों द्वारा षडयंत्रपूर्वक जानबूझकर भुला दिया गया -
मैं अपना छोटा सा प्रयास महाकवि श्रीकृष्ण ' सरल ' की इन पंक्तियों के साथ प्रारंभ करता हूँ -
" मैं अमर शहीदों का चारण , उनके यश गाया करता हूँ ,
जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है मैं उसे चुकाया करता हूँ . "

------------------------- अष्टक और अश्वक -------------------------


हममें से अधिकतर लोग जानते हैं कि भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम आक्रांता सिकंदर ( अलैग्जैंडर ) था पर ये पूरी तरह सही नहीं है भारत पर जिस देश ने सबसे पहले हमला किया था वो था पर्शिया ( आज का ईरान ) और आक्रांता था - सायरस महान ( ५५८ - ५३० ई.पू. ) . इसकी भेजी प्रथम सेना वीर अष्टकों और अश्वकों की तलवारों की भेंट चढ गयी . द्वितीय अभियान में उसने अभूतपूर्व क्रूरता प्रदर्शित की जिसके कारण उसका अधिकार पूर्वी गांधार पर हो गया पर ये भाग कभी भी उसके प्रत्यक्ष शासन में ना आ सके . सायरस के पुत्र डरायस प्रथम ने पश्चिमी गांधार पर अभियान किया और केवल खुद बचकर आ सका . उसके वंशज जरक्सीज और अर्टाजरक्सीज भी व्यर्थ ही इस क्षेत्र को अपने अधिकार में रखने की कोशिश करते रहे पर कभी सफल ना हो सके और आखिरकार उन्हें गांधार से विदा होना ही पडा .
ये " अष्टक और अश्वक " ही थे , भारत की प्रथम सुरक्षा दीवार जिन्हें हम शायद ही जानते हों कि एक हाथ में खड्ग और एक हाथ में शास्त्रों को धारण कर किस तरह इन्होंने अपने समतामूलक गणतंत्र की रक्षा की , कि किस तरह इनकी पीढियों ने अपना खून ईरानियों को सिंधु पार करने से रोकने के लिये बहाया , कि किस तरह इन महान वीरों ने भारत के गौरव की रक्षा की .
आज मैं इन अज्ञात वीरों को उनके " गणनाम " की पहचान के आधार पर ही प्रणाम करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि इनके भटके हुए वर्तमान वंशजों को उनकी जातीय स्मृति लौटायें कि आर्यत्व की रक्षा के लिये किस तरह उनके पूर्वज जिये और मरे