Saturday, 31 January 2015

........................        प्राचीन भारत के गणतंत्र       ..........................

" अष्टक और अश्वकों " के संदर्भ में इनसे संबंधित कई तथ्य हम लोग नहीं जानते इसलिये " Unsung Heroes " की कडी आगे बढाने से पूर्व भारत के इतिहास के उस कालखंड और उस युग की कुछ राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियों के बारे में चर्चा करना उचित रहेगा . इसलिये मैं इस पूरक लेख को प्रस्तुत कर रहा हूँ .
भारत में प्राचीन काल से दो राजनैतिक और सामाजिक धारायें थीं - एक समतावादी परंतु रक्त संबंध आधारित गणतंत्र प्रणाली और दूसरी जन्मना जाति व्यवस्था आधारित साम्राज्यवादी राजतंत्र प्रणाली . मगध , अवंति , कौशांबी , काशी आदि कुछ जनपदों को छोडकर प्रायः शेष भाग में " गणतंत्र प्रणाली " ही प्रचलित थी जिनमें कभी कभी कुछ व्यक्ति अत्यधिक शक्तिशाली होकर उन्हें " राजतंत्र " में बदलने की कोशिश भी करते थे परंतु प्रायः उनके गण सद्स्य कम या अधिक समय बाद उसे वापस " गणतंत्र " के रूप में ले आते थे . एसा तब तक चलता रहा जबतक कि पूर्व के गण्तंत्रों को मगध साम्राज्य ने और उत्तर व पश्चिम के गणतंत्रों को गुप्त साम्राज्य ने स्थाई रूप से निगल ना लिया .
अस्तु ! गणक्षत्रियों के नेतृत्व वाले गणतंत्रों के नाम या तो उनके किसी पूर्वज ( मालव , लिच्छिवि , यौधेय, शिवि ) , भौगोलिक क्षेत्र ( क्षुद्रक , गोरी ) या उनके टॉटेम ( अश्व , हस्ति , काक , गज , नाग , मूषिक , उदुंबर ) आदि के नाम पर होता था . पूरा उत्तरी भारत और उत्तर पश्चिम से सुदूर ऑक्सस नदी तक का क्षेत्र एसे गणतंत्रों से भरा पडा था और हर आक्रमणकारी को पहले भारत की इस प्रथम सुरक्षा दीवार से टकराना होता था .
ये गणतंत्र अपनी संसद का चुनाव करते थे , विषयों पर संसद में बहस होती थी और वोटिंग द्वारा बहुमत से प्रस्ताव पारित होता था . गणतंत्र का प्रत्येक सद्स्य रक्तसंबंध के कारण " समान " माना जाता था और प्रत्येक व्यक्ति वेद शास्त्रों में प्रवीण था और शिक्षा , व्यापार आदि कोई भी व्यवसाय करने के लिये स्वतंत्र था परंतु शस्त्र शिक्षा और आवश्यकता पडने पर युद्ध में शामिल होना सभी के लिये अनिवार्य था . ( हालांकि अधिकतर सद्स्य शस्त्रोपजीवी ही ज्यादा थे )
इन गणतंत्रों की तीन मूल कमजोरियाँ थीं - १ - इनका गणतंत्र केवल रक्त संबंधी सद्स्य को ही प्रशासन में भाग लेने देता था . २-- ये परस्पर बहुत युद्धरत रहते थे . ३- साम्राज्यवादी वर्णव्यवस्था के विरुद्ध ये सदैव प्रतिरक्षात्मक ही रह पाते थे . ( इस दृष्टि से ये अपने परवर्ती वंशजों राजपूतों की ही भांति थे ) और एक पराजय से ही इनका समूल नाश हो जाता था जैसे कि मगध के द्वारा लिच्छिवियों का , सिकंदर, शक , कुषाणों , हूणों के द्वारा इन पश्चिमोत्तर गणों का और गुप्त साम्राज्य द्वारा अंतिम गणराज्यों यौधेय , आर्जुनायन , कूणिंद और मालवों का हुआ जिनके अवशिष्ट वंशजो + राजतंत्री क्षत्रियों + अवशिष्ट शक , हूण , कुषाण आदि के स्थानीय वंशजों के रक्त मिश्रण से वर्तमान राजपूतों , ब्राह्मणों , गुर्जरों , जाटों और अग्रवालों के कुछ गोत्रों की उत्पत्ति हुई .

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