Saturday, 31 January 2015

---------------------     Unsung Heroes - 2      --------------------


                .......................        कठ       .........................


आप इतिहास की सामान्य जानकारी रखने वाले किसी भी व्यक्ति से पूछिये कि सिकंदर से भारत में कौन लडा था ? किसने उसे वापस जाने पर मजबूर किया था ?? तुरंत जवाब मिलेगा - पोरस .

पर क्या वास्तव में यही सचाई है ? या अधूरी सचाई है ?? महान ईरानी साम्राज्य को ध्वस्त करने वाली , पोरस के हाथियों के सामने भी डटकर खडी रहने वाली सिकंदर की विश्वविजयी सेना ने विपाशा ( व्यास ) नदी से आगे बढने  इंकार कर सिकंदर से विद्रोह क्यों कर दिया ? किससे डर गये थे वे ?? यूनानी इतिहासकारों ने तो उनके इस ' डर ' को  छिपाया ही है , भारतीय इतिहासकारों ने भी " व्यक्ति पूजा " की प्रवृत्ति के चलते इस घटना के महान नायकों को नेपथ्य में डाल दिया .
और ये थे............ " कठ " .

कौन थे ये " कठ " ? क्या विशेषता थी इनकी ?? क्यों यूनानी इनसे जीत कर भी अपना साहस गंवा बैठे थे ??? आइये जानते हैं ...

वैदिक आर्यों का एक प्रसिद्ध जन " मद्र " ( नकुल सहदेव की माँ इसी मद्र की राजकुमारी थीं ) था जो रावी नदी के किनारे अवस्थित था और शाकल ( स्यालकोट ) इनकी राजधानी थी . कालांतर में इनकी ही एक शाखा " कठ " सर्वाधिक प्रभुत्वपूर्ण सिद्ध हुई क्योंकि इन्होंने आज से २५०० साल पहले " यूजेनिक्स " के सिद्धांत अपनाकर जैसी उच्च उपलब्धियाँ अर्जित कीं उसकी तुलना कुछ हद तक सिर्फ " स्पार्टा " ,  " मालवों " और पूर्वी भारत के " लिच्छिवियों " से ही की जा सकती है . स्पार्टा के लोगों की ही भांति कठ अपने यहाँ ' शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर " और " असुंदर " शिशुओं को जीने नहीं देते थे और उन्हें मार डालते थे . इसके परिणाम स्वरूप हर कठ युवक  क्षीर गौर वर्ण ,पीत केश , नील या स्वर्ण वर्णी नेत्र  , अत्यधिक लंबाई , दृढ शरीर और उच्च मस्तिष्क का स्वामी होता था . शस्त्रों और शास्त्रों में इनकी समान गति थी . जितने भयंकर ये योद्धा थे उतने ही अधिक चिंतनशील थे जिसका प्रमाण है " कठोपनिषद " ....

जी हाँ प्रसिद्ध उपनिषदकार -" नचिकेता " इसी कठ गणराज्य के गणक्षत्रिय थे जो प्रसिद्ध ऋषि बने .

अस्तु , झेलम के युद्ध में पोरस पर विजय ( ? ) या संधि के पश्चात सिकंदर आगे बढा और जा टकराया कठों से जिन्होंने अपने नगर सांकल के चारों ओर एक अद्भुत व्यूह रच दिया जिसके बारे में सिकंदर ने सुना तक नहीं था - " रथ व्यूह " एक एसा व्यूह जिसका उपयोग २००० साल बाद यूरोप में  महान चैक हीरो " यान झीझका " ने  प्रशियन नाइट्स के विरुद्ध  अभेद्य " शकट व्यूह " के रूप में किया . ...बेचारा सिकंदर...... उसके तथाकथित अजेय अश्वारोही जाते और इस व्यूह से सिर टकराकर अपनी बलि दे देते ....हजारों की संख्या में यूनानी मारे गये और सिकंदर हताश हो उठा ...पर ....पर...पर ...हाय रे भारत का दुर्भाग्य...... हमेशा की तरह ...इन वीरों को " स्वघात "  का सामना करना पडा और इस बार ये काम किया खुद " पोरस " ने जी हाँ पोरस ने  ...रथ व्यूह को सिर्फ हाथियों से ही तोडा जा सकता था और ये बात पोरस जानता था और उसने अपने साम्राज्य को बढाने के लालच में यह देशघाती कृत्य किया . ( हालांकि बाद में उसे इसका पश्चाताप हुआ और चंद्रगुप्त के विद्रोह को सहायता देकर इसका प्रायश्चित्त भी किया जिसके कारण ही यूनानी क्षत्रप यूथेडेमस ने उसकी हत्या कर दी थी .)
रथ व्यूह टूट जाने पर भी कठों ने हथियार डालना स्वीकार नहीं किया और सैकडों युनानियों को मारते हुए अपने प्राण दे दिये . लगभग १७००० पुरुष लडते मारे गये और ७०००० स्त्रियों और बच्चों को बंदी बनाया गया , जिनका क्या हुआ पता नहीं . सांगल को इतनी बुरी तरह नष्ट किया गया कि आज तक इतिअहासकार उसके ध्वंसावशेषों को ढूँढ नहीं पाये हैं .

परंतु इस भीषण प्रतिरोध से यूनानी सैनिक इतने आतांकित हो गये कि व्यास के किनारे उन्होंने आगे बढने से साफ इनकार कर दिया और सिकंदर को लौटने के लिये विवश होना पडा . परंतु युद्ध के नियमों के विपरीत  कठों के भीषण नरसंहार से भन्नाये हुए  भारतीयों ने जैसे सिकंदर को भारत से जिंदा बाहर ना जाने देने की सौगंध खा ली थी और तब सिकंदर को सामना करना पडा मालवों का जिनके दिये घाव ,कहते हैं कि सिकंदर की मृत्यु का कारण बने . ( इन मालवों के बारे में अगले अंक में )  ------- तो ये थे वे महान कठ जिनके कारण उत्पन्न जनाक्रोश चंद्रगुप्त मौर्य के द्वारा भारत के राष्ट्रीय एकीकरण का आधार बना .

इसके बाद फिर कठों के बारे में फिर कभी कुछ नहीं सुना गया . तैमूरनामा में किसी " कोठार " जाति का उल्लेख अवश्य है जिसने पंजाब में तैमूर की सेना की भीषण क्षति की थी और मेरा मानना है कि ये उन्हीं कठों के अवशिष्ट वंशज रहे होंगे . इसके बाद कालदेवता यम से भी जीतकर लौट आने वाले नचिकेता के कठों का नाम भारत के इतिहास से सदा के लिये विलुप्त हो गया .

आज  २५ जनवरी , गणतंत्र दिवस के पूर्व दिवस पर भारत के इन महान सपूतों को जिनके रक्त से भारत की महानता की नींव रखी गयी ,  अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि .......मेरी ओर से ....मेरे  कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से  ..जिन्होंने हमारे आज के लिये अपने खुद के वर्तमान को मिटा दिया और इतिहास के पन्नों में चुपचाप समा गये .......

........................        प्राचीन भारत के गणतंत्र       ..........................

" अष्टक और अश्वकों " के संदर्भ में इनसे संबंधित कई तथ्य हम लोग नहीं जानते इसलिये " Unsung Heroes " की कडी आगे बढाने से पूर्व भारत के इतिहास के उस कालखंड और उस युग की कुछ राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियों के बारे में चर्चा करना उचित रहेगा . इसलिये मैं इस पूरक लेख को प्रस्तुत कर रहा हूँ .
भारत में प्राचीन काल से दो राजनैतिक और सामाजिक धारायें थीं - एक समतावादी परंतु रक्त संबंध आधारित गणतंत्र प्रणाली और दूसरी जन्मना जाति व्यवस्था आधारित साम्राज्यवादी राजतंत्र प्रणाली . मगध , अवंति , कौशांबी , काशी आदि कुछ जनपदों को छोडकर प्रायः शेष भाग में " गणतंत्र प्रणाली " ही प्रचलित थी जिनमें कभी कभी कुछ व्यक्ति अत्यधिक शक्तिशाली होकर उन्हें " राजतंत्र " में बदलने की कोशिश भी करते थे परंतु प्रायः उनके गण सद्स्य कम या अधिक समय बाद उसे वापस " गणतंत्र " के रूप में ले आते थे . एसा तब तक चलता रहा जबतक कि पूर्व के गण्तंत्रों को मगध साम्राज्य ने और उत्तर व पश्चिम के गणतंत्रों को गुप्त साम्राज्य ने स्थाई रूप से निगल ना लिया .
अस्तु ! गणक्षत्रियों के नेतृत्व वाले गणतंत्रों के नाम या तो उनके किसी पूर्वज ( मालव , लिच्छिवि , यौधेय, शिवि ) , भौगोलिक क्षेत्र ( क्षुद्रक , गोरी ) या उनके टॉटेम ( अश्व , हस्ति , काक , गज , नाग , मूषिक , उदुंबर ) आदि के नाम पर होता था . पूरा उत्तरी भारत और उत्तर पश्चिम से सुदूर ऑक्सस नदी तक का क्षेत्र एसे गणतंत्रों से भरा पडा था और हर आक्रमणकारी को पहले भारत की इस प्रथम सुरक्षा दीवार से टकराना होता था .
ये गणतंत्र अपनी संसद का चुनाव करते थे , विषयों पर संसद में बहस होती थी और वोटिंग द्वारा बहुमत से प्रस्ताव पारित होता था . गणतंत्र का प्रत्येक सद्स्य रक्तसंबंध के कारण " समान " माना जाता था और प्रत्येक व्यक्ति वेद शास्त्रों में प्रवीण था और शिक्षा , व्यापार आदि कोई भी व्यवसाय करने के लिये स्वतंत्र था परंतु शस्त्र शिक्षा और आवश्यकता पडने पर युद्ध में शामिल होना सभी के लिये अनिवार्य था . ( हालांकि अधिकतर सद्स्य शस्त्रोपजीवी ही ज्यादा थे )
इन गणतंत्रों की तीन मूल कमजोरियाँ थीं - १ - इनका गणतंत्र केवल रक्त संबंधी सद्स्य को ही प्रशासन में भाग लेने देता था . २-- ये परस्पर बहुत युद्धरत रहते थे . ३- साम्राज्यवादी वर्णव्यवस्था के विरुद्ध ये सदैव प्रतिरक्षात्मक ही रह पाते थे . ( इस दृष्टि से ये अपने परवर्ती वंशजों राजपूतों की ही भांति थे ) और एक पराजय से ही इनका समूल नाश हो जाता था जैसे कि मगध के द्वारा लिच्छिवियों का , सिकंदर, शक , कुषाणों , हूणों के द्वारा इन पश्चिमोत्तर गणों का और गुप्त साम्राज्य द्वारा अंतिम गणराज्यों यौधेय , आर्जुनायन , कूणिंद और मालवों का हुआ जिनके अवशिष्ट वंशजो + राजतंत्री क्षत्रियों + अवशिष्ट शक , हूण , कुषाण आदि के स्थानीय वंशजों के रक्त मिश्रण से वर्तमान राजपूतों , ब्राह्मणों , गुर्जरों , जाटों और अग्रवालों के कुछ गोत्रों की उत्पत्ति हुई .

---------------------- Unsung heroes  - 1  ------------------

..............................अष्टक  और अश्वक ...........................


यूनान की महानता के द्वार थर्मोपायली पर वीर लियोनाइडस और उसके ३०० स्पार्टन वीरों के बलिदान की गाथा सुनाता एक अभिलेख है जिसके मर्मस्पशी शब्द हैं-
Stranger, go tell the Spartans
That we lie here
True, even to the death
To our Spartan way of life
इन शब्दों में ही पश्चिमी सभ्यता की महानता और सार्वभौमिकता का राज छिपा हुआ है . पश्चिम ने कभी अपने वीरों और उनके बलिदानों को हमारी तरह बिसराया नहीं और नतीजा पश्चिमी सभ्यता संसार भर में व्याप्त हो गयी . उनकी स्वातंत्रयप्रियता , बलिदान और उनसे प्राप्त प्रेरणा ने ही पश्चिमी सभ्यता को विश्वव्यापी बनाया है .
इसके विपरीत हमने क्या किया ? अपने वीरों को , उनके बलिदानों को कपोल कल्पनायें कहकर उन्हें बिसरा दिया , मुँह मोड लिया उनकी पहचान से , उनके दर्द से और उन्हें इतिहास में दफन कर दिया . हमने खुद पराजयबोध ओढ लिया . हमने मान लिया कि हम तो हारते ही आये हैं और हम तो बने ही हारने और गुलामी के लिये . हमने अपने उन हुतात्माओं की प्रचंड वीरगाथाओं को ' मिथक ' करार दे दिया जिनके कारण ही हम गर्व से कहते आये हैं कि -- " कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी "
पर कभी जाना कितने अनजाने नायकों के शवों पर आपकी आज की आजादी खडी है ?
आज भारत के अनन्य स्वतंत्रता सेनानी और भारत में " गुरिल्ला युद्ध पद्दति के जन्मदाता " वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की पुण्य तिथि पर मेरा प्रयास है भारत के उन अनजान वीरों को फेसबुक के माध्यम से सामने लाना जिन्हें वर्तमान धूर्त वामपंथी और मुस्लिम तुष्टिकरण वादी इतिहासकारों द्वारा षडयंत्रपूर्वक जानबूझकर भुला दिया गया -
मैं अपना छोटा सा प्रयास महाकवि श्रीकृष्ण ' सरल ' की इन पंक्तियों के साथ प्रारंभ करता हूँ -
" मैं अमर शहीदों का चारण , उनके यश गाया करता हूँ ,
जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है मैं उसे चुकाया करता हूँ . "

------------------------- अष्टक और अश्वक -------------------------


हममें से अधिकतर लोग जानते हैं कि भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम आक्रांता सिकंदर ( अलैग्जैंडर ) था पर ये पूरी तरह सही नहीं है भारत पर जिस देश ने सबसे पहले हमला किया था वो था पर्शिया ( आज का ईरान ) और आक्रांता था - सायरस महान ( ५५८ - ५३० ई.पू. ) . इसकी भेजी प्रथम सेना वीर अष्टकों और अश्वकों की तलवारों की भेंट चढ गयी . द्वितीय अभियान में उसने अभूतपूर्व क्रूरता प्रदर्शित की जिसके कारण उसका अधिकार पूर्वी गांधार पर हो गया पर ये भाग कभी भी उसके प्रत्यक्ष शासन में ना आ सके . सायरस के पुत्र डरायस प्रथम ने पश्चिमी गांधार पर अभियान किया और केवल खुद बचकर आ सका . उसके वंशज जरक्सीज और अर्टाजरक्सीज भी व्यर्थ ही इस क्षेत्र को अपने अधिकार में रखने की कोशिश करते रहे पर कभी सफल ना हो सके और आखिरकार उन्हें गांधार से विदा होना ही पडा .
ये " अष्टक और अश्वक " ही थे , भारत की प्रथम सुरक्षा दीवार जिन्हें हम शायद ही जानते हों कि एक हाथ में खड्ग और एक हाथ में शास्त्रों को धारण कर किस तरह इन्होंने अपने समतामूलक गणतंत्र की रक्षा की , कि किस तरह इनकी पीढियों ने अपना खून ईरानियों को सिंधु पार करने से रोकने के लिये बहाया , कि किस तरह इन महान वीरों ने भारत के गौरव की रक्षा की .
आज मैं इन अज्ञात वीरों को उनके " गणनाम " की पहचान के आधार पर ही प्रणाम करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि इनके भटके हुए वर्तमान वंशजों को उनकी जातीय स्मृति लौटायें कि आर्यत्व की रक्षा के लिये किस तरह उनके पूर्वज जिये और मरे

Wednesday, 29 October 2014

                                   ----  श्रीमद्भगवद्गीता   ;  आधुनिक वैज्ञानिक शब्दावली में  -----


विज्ञान के विकास और विशेषतः क्वांटम फिजिक्स के विकास के साथ ही विज्ञान  ' अध्यात्म ' के उन बिंदुओं के उद्घाटन की ओर बढ रहा है जिन्हें  भारत के ऋषि व्यक्तिगत चिंतन द्वारा सैकडों साल पूर्व उद्घाटित कर चुके थे . यही कारण है कि आइंस्टाइन ने  ' धर्म और विज्ञान ' को एक ही सिक्के के दो पहलू कहा था . चूँकि अभी पूर्व के दर्शन और अध्यात्म के संदर्भ विज्ञान की नजरों में पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुए इसलिये हम अभी विज्ञान और गणित के आधारीय नियमों के आधार पर ही गीता और वैदिक सिद्धांतों की व्याख्या कर सकते हैं --  अध्यात्म और दर्शन की शब्दावली के कुछ शब्द अभी विज्ञान की दृष्टि से ' अपरिभाषित ' हैं जिनके ऊपर गहन शोध किया जाना बाकी है .... उदाहरण के लिये हिंदू दर्शन संसार के प्रत्येक कण को ' जीवित '  और  ' चेतनामय ' मानता है जबकि जीव विज्ञान  कुछ लक्षणों के आधार पर ' जीवन ' की कसौटी निर्धारित करता है . पर अगर  ' ऊर्जा  और द्रव्यमान ' के आधार पर व्याख्या की जाये तो एक कंकर भी ' चैतन्य ' यानि कि जीवित माना जा सकता है क्योंकि उसका अस्तित्व  भी उसी ' ऊर्जा - द्रव्यमान ' समीकरण   के आधार पर है जिस पर किसी ' ' जीवित जीव ' का अस्तित्व  ...... आखिरकार .तो  वे ' मूल शब्द ' ( terms )  क्या हैं  ----

१-- आत्मा क्या है -----  निश्चित रूप से एक रहस्यमय ऊर्जा जो संसार के समस्त जड और चेतन में व्याप्त है . औपनिषदक विचारधारा इसे परमात्मा का अंश मानते हुए अटल ध्रुव शाश्वत सत्ता मानती है और इसके ऊर्जात्मक रूप के अनुसार ठीक भी है पर बुद्ध ने इसकी अटलता , अपरिवर्तनीयता और जीव से संबंध  पर सवाल उठाया . आज की भाषा में कहें तो उन्होंने एक कोशिकीय जीवों से बहुकोशिकीय जीवों में ' आत्मा के स्वरूप में संक्रमण ' पर सवाल उठाया और पर्याप्त शब्दावली के अभाव के आधार पर इसे ध्रुव और शाश्वत होना अस्वीकार कर दिया . परंतु उनके सामने एक दूसरा सत्य खडा था और वो था कर्म सिद्धांत और पुनर्जन्म . और तब उन्होंने अपनी मेधा का प्रयोग करते हुए स्थापना दी कि जन्म इच्छाओं का होता है ठीक किसी लहर की भांति जहाँ पिछली लहर ( पिछले कर्म ) अगली लहर को उत्पन्न करती है पर यथार्थ में जल केवल ऊपर और नीचे होता है .

२-- इच्छा क्या है -----  यह भी ऊर्जा का ही एक प्रकार है जिसे हम महसूस कर सकते हैं जो जीव को कर्म के लिये प्रेरित करती है . इसके बिना आत्मा और ब्रह्मांड अस्तित्व में ही नहीं आते . इसी लिये आर्ष ग्रंथों में कहा गया है कि ' ब्रह्म ' ने कामना की कि मुझे  ' होना 'चाहिये और वह '  हो ' उठा . पर यह अवधारणा ब्रह्म की   " निर्लिप्त निराकार व कालातीत ' होने की अवधारणा पर सवाल उठाती थी इसलिये बाद में स्थापना दी गयी कि ब्रह्म में स्वतः उठने वाले क्षोभ से ब्रह्मांड बनने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई . अतः इसी क्षोभ को ही ' इच्छा ' का प्रारंभिक रूप माना जा सकता है परंतु यह अकस्मात और स्वतः उत्पन्न हुआ था अतः ब्रह्मांड की उत्पत्ति  बिना कारण - कार्य  के स्वतः हुई . और प्रारंभिक विक्षोभ को हम पहली इच्छा और असंतुलन का प्रारंभ मान सकते हैं जिसके पश्चात ब्रह्मांड का निर्माण प्रारंभ हुआ . आज की भाषा में इसे  " हमारे ब्रह्मांड " की एंट्रॉपी भी कह सकते हैं जिसके कारण ब्रह्मांड में निरंतर  संतुलन और प्रतिसंतुलन की एक हौच पौच रहती है परंतु इस नाजुक असंतुलन से ही ब्रह्मांड संतुलित रूप से गतिमान रहता है और उसका का कारोबार चलता है यानि कि ' इच्छा ' भी ब्रह्मांड के संचालित करने वाली एक शक्ति है . 
     तो..... जब यह '  इच्छा ' रूपी  ऊर्जा  ' आत्मा ' रूपी ऊर्जा को ढँकती है तो जन्म होता है  ' सूक्ष्म शरीर ' का जो अपनी इच्छाओं के कारण , उसकी पूर्ति के लिये ' कर्म ' करना चाहता है . यही कारण है कि हम अपनी इच्छाओं में इतने आसक्त और लिप्त होते हैं . इस प्रकार इस सिद्धांत से सनातनी विचारधारा और बुद्ध की विचारधारा , दोंनों से से पुनर्जन्म की व्याख्या हो जाती है .


३--  कर्म क्या है ---- कर्म भी ऊर्जा का ही एक और प्रकार है जिसे हम ' इच्छाओं ' के निर्देशन में करते हैं जिसका परिणाम होता है --  ' फल ' अर्थात द्रव्यमान . इसीलिये बढते अच्छे बुरे कर्मों के अनुसार ' आत्मा ' पर ' इच्छा ' , ' कर्म ' और  ' कर्म फल ' के आवरण चढता चला जाता है और ' जीव ' अधिकाधिक इस ब्रह्मांड में  आवागमन के चक्र में फंसता चला जाता है  

                                                      तो अगर कोई इच्छाओं के अधीनहोकर कर्म करने के स्थान पर निष्काम कर्म अर्थात अनासक्त कर्म करे तो --- निश्चित रूप से फल तो  आयेगा ही परंतु आत्मा के ऊपर ना केवल इच्छाओं की नयी पर्तें  चढना बंद होंगी बल्कि इस कर्म रूपी ऊर्जा के द्वारा पुराने कर्म फल भी नष्ट होना प्रारंभ हो  जायेंगे  क्यों कि अनासक्ति होने पर उन पुरातन  इच्छाओं के होने का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा और वे स्वतः विलोपित हो जायेंगी . और ...तब इच्छा , कर्म और कर्मफल के हटने से विशुद्ध आत्मा प्रकट होगी अपने पूर्ण ' ब्रह्म ' स्वरूप में  , ठीक वैसे ही जैसे  ऊपर की राख हट जाने पर अंगारा प्रकट हो जाता है .

४ -- फल क्या है ---  इच्छाओं के निर्देशन में ' परमाणुओं को संयोजित कर एक आकार धारण करना ही फल है .  द्रव्यमान की मूल इकाई ' परमाणु ' है पर उसका चरम विकसित और चेतन रूप है ' जीवन ' और जीवन में भी सबसे ' पूर्ण चैतन्य रूप है ' -- " मानव " जिसकी चेतना का स्तर इतना ऊँचा होता है कि वह इच्छाओं के बंधन से मुक्त होकर अपने वास्तविक ऊर्जा रूप अर्थात " आत्मा " को जान सकता है और ब्रह्मांड के नियमों से मुक्त होकर पुनः उसी ब्रह्म से जुड सकता है जिससे कभी वो पृथक हुआ था . इसी को ' मोक्ष ' कहा गया है . परंतु मनुष्य इच्छाओं के अधीन होकर , शरीर और अहंकार की तॄप्ति को ही वास्तविकता समझता है जिसके कारण ही ये संसार ब्रह्मांड के उन भौतिक नियमों पर चलता है  जिनका निर्धारण ' हमारे ब्रह्मांड ' के जन्म के समय ही हो गया था .

५-- मोक्ष क्या है --- जब कोई मनुष्य अपनी जैविक ऊर्जा का संयोग  ब्रह्मांड की उस ऊर्जा से करा देता है जो इच्छाओं और कर्मों के आवरणों में ढंकी हुई है और जिसे हम आत्मा कहते है , तो उसी पल हमें अपने वास्तविक  " ब्रह्म स्वरूप " अर्थात "  मूल ऊर्जा रूप  " का ज्ञान हो जाता है और तब ये जगत एक स्वप्न के समान दिखाई देता है . ( ये केवल सैद्धांतिक प्रेजेटेंशन है क्यों कि इसका वास्तविक अनुभव व्यवहारिकता में कठिन है बहुत ही कठिन )

६-- मोक्ष अर्थात ब्रह्म प्राप्ति के मार्ग क्या हैं --- गीता के अनुसार यह " योग " है जिसका अर्थ कृष्ण ने बताया है " परमात्मा या ब्रह्म से जीव का योग " . गीता में योग के अनेक प्रकारों का विवरण है जिन्हें मोटे रूप से सांख्य , ध्यान  , कर्म  और भक्ति में बाँटा जा सकता है . अर्थात कृष्ण प्रत्येक को अपने  ' स्वधर्म ' अर्तात अपनी प्रवृत्ति के अनुसार चुनाव की छूट देते हैं . कई विद्वान इसमें विरोधाभास ढूँढते हैं  परंतु उनकी उद्घोषणा है कि प्रत्येक मार्ग अंततः ' उन ' तक ही लेकर आयेगा . कैसे ? वैज्ञानिक नजरिये से क्या इसकी व्याख्या संभव है ?? कृष्ण ने इसके संकेत स्पष्ट दे रखे हैं पर फिर भी क्यों न हम अपने तार्किक नजरिये से उनकी उद्घोषणा को परख लें  ----

१- सांख्य या ज्ञान ---  इसके अनुसार जीव में  " अकर्ता " का भाव होता है और वह कर्म करते हुए भी उसके प्रति स्वयं को ' उससे '  परे रखता है जिसके कारण वह ' कर्म फल ' के प्रति भी  ' अनुत्तरदायित्व ' का भाव रखता है . यह विधि बहुत कुछ बौद्ध विधि और अन्य नास्तिक दर्शनों के समान है पर कृष्ण अधिकारपूर्वक घोषणा करते हैं कि कर्म और कर्मफल के प्रति ' अनुत्तरदायित्व ' का भाव उस जीव को अंततः ' इच्छाओं ' से भी मुक्त कर देता है और तब भी वह आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है . ( यहाँ कपिल और बुद्ध  ' ब्रह्म ' या  ' ईश्वर '  के विषय में मौन हैं )

२- ध्यान --- इसे हठ योग भी कहा जा सकता है जिसमें शरीर को शुद्ध ( पंच कर्मादि ) कर भ्रू मध्य या नासिकाग्र पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है . यह अत्यंत कठिन विधि है और इसमें सामान्य साधक को किसी योग्य गुरू की आवश्यकता होती है . इस मत के अनुसार जीव की समस्त जैविक ऊर्जा  (  कर्म  व कर्मफल सहित ) " मूलाधार चक्र "  से होती हुई  विभिन्न चक्रों को पार करती हुई " सहस्त्रार " तक पहुँचती है जो ब्रह्म रूपी परम ऊर्जा का द्वार है और जहाँ पहुँच कर जीव के समस्त कर्मों , कर्म फल और इच्छाओं का विलीनीकरण हो जाता है . परंतु साधारण शरीर वाले योगी प्रायः लौटते नहीं और उसी समाधि अवस्था में ' ब्रह्मरंध्र ' से उनकी आत्मा का लय ' ब्रह्म ' में हो जाता है . कुछ सूफी भी इस हिंदू योग पद्धति से परिचित थे और उन्होंने  इन चक्रों का विवरण अन्य नामों से दिया है .

३- कर्म ---  यह गीता की सबसे चर्चित विधि है जिसमें सांख्य और योग को दुःसाध्य मानते हुए जीव को कर्म करने का सुझाव दिया गया है परंतु उसे  ' निष्काम ' अर्थात  केवल कर्म में ही आसक्ति रखने का अधिकार दिया गया है फल में नहीं ( साम्यवादियों और तथाकथित दलित चिंतकों ने इसका सबसे ज्यादा अनर्थ किया है )  . कृष्ण का कहना है कि फल में आसक्ति होने से वर्तमान कर्म में तो एकाग्रता  बाधित होगी  ही साथ फल में आसक्ति से नयी इच्छाओं का बंधन भी आत्मा के ऊपर बन जायेगा . परंतु अगर निष्काम कर्म किया जाये तो चाहे जो फल प्राप्त हों परंतु नयी इच्छायें न होने से पुराने कर्म और कर्मफल क्रमशः नष्ट होते चले जायेंगे और अंततः ' आत्मा ' अपने विशुद्ध ' ब्रह्म ' स्वरूप में प्रकट हो जायेगी और मोक्ष को प्राप्त होगी . ( इसमें पूर्वकर्मों के फल सामने आते तो हैं पर पूर्ण साधक उनसे भी अनासक्त रहता है )

४- भक्ति -- इसे कृष्ण ने सर्वाधिक सरल उपाय माना है परंतु  ' सकाम ' और ' निष्काम ' भक्ति में बांट कर एक चेतावनी भी दी है . सकाम भक्ति से जीव अपने ' आराध्य ' के स्वरूप को प्राप्त होता है परंतु उसकी मुक्ति असंभव होती है क्यों कि इच्छाओं और कर्मों का बंधन समाप्त नहीं होता . जबकि ' प्रेम ' जो बिना आकांक्षा , बिना इच्छा का एक अनजाना ' निष्काम '  भाव है ,  उसके द्वारा  किसी भी " माध्यम " ( मूर्ति , स्वरूप , नाम )  से परम सत्ता से अगाध रूप से  जुड जाता है तो उसकी समस्त इच्छायें , समस्त कर्म और कर्मफल  ' क्षण मात्र ' में  विलीन हो जाते हैं जैसे ' अग्नि ' में सोने के ऊपर लिपटी ' मैल ' की पर्त नष्ट हो जाती है और खरा सोना प्रकट हो जाता है . ( पर कई बार माध्यम की आसक्ति उसे अंतिम पद से रोक भी देती है जैसे कि रामकृष्ण परमहंस ने वर्णित किया था कि किस तरक ' काली ' में उनकी आसक्ति ने उन्हें आखिरी चरण में जाने से रोक रखा था ) ..चैतन्य , मीरा और रामकृष्ण परमहंस इसी माध्यम को सर्वाधिक सरल और उचित मानते थे .

       तो स्पष्ट है कि कृष्ण के प्रत्येक मार्ग में  ' जीव ' का संपर्क ' आत्मा ' के माध्यम से अपने असली ' ब्रह्म स्वरूप ' से होता है तो मोक्ष हो जाता है  . पर एसी स्थिति में कर्म सिद्धांत का क्या ? विशेषतः ' ध्यान ' और ' भक्ति ' जैसे ' शॉर्टकट ' मामले में जहाँ कृष्ण उद्घोषणा करते हैं कि तूने चाहे जो किया हो बस तू एक बार मेरी शरण में आ भर जा ...... तो पहले तो यह जान लें सभी लोग कि यहाँ कॄष्ण कोई एक केवल यदुवंशी कृष्ण नहीं बल्कि ' योगयुक्त साक्षात परब्रह्म ' बोल रहे हैं  . दुसरी बात वे कह रहे हैं कि मैं तुझे सारे पापों सारे कर्म फलों और इच्छाओं से मुक्त कर दूँगा ...कैसे ....क्यों कि ये इच्छायें , ये कर्म , ये कर्म फल , ये आत्मा  ...ये सभी ऊर्जायें  उस ' ब्रह्म रूपी ऊर्जा ' से ही तो उत्पन्न हुई थीं तो समस्त द्रव्यमान और ऊर्जा के विभिन्न रूप इस परम ऊर्जा के संपर्क में आते ही क्षण मात्र में अपना मूल रूप प्राप्त कर लेते हैं और एसा जीव स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाता है ठीक वैसे ही जैसे किसी भी संख्या का गुणा शून्य से करने पर वह बिना किसी चरण के  तत्काल शून्य हो जाती है . इस तरह से भक्ति और योग मार्ग जैसे " शॉर्टकट " से भी कॄष्ण के कर्म सिद्धांत का उल्लंघन नहीं होता है  .  ( इति )